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अध्याय 4 · 42 श्लोक
ज्ञानकर्मसंन्यासयोगः

ज्ञानकर्मसंन्यासयोग

श्रीकृष्ण अपने अवतार-रहस्य (धर्म-संस्थापना हेतु युग-युग में अवतरण) एवं कर्म-अकर्म के सूक्ष्म भेद को स्पष्ट करते हैं; ज्ञान की महिमा का वर्णन।

श्लोक 7
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
yadā yadā hi dharmasya glānir bhavati bhārata, abhyutthānam adharmasya tadātmānaṁ sṛjāmy aham
हिन्दी अनुवाद

हे भारत (अर्जुन)! जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं स्वयं को रचता (अवतरित करता) हूँ।

सरल व्याख्या

यह गीता का सबसे प्रसिद्ध श्लोकों में से एक है — ईश्वर के अवतार लेने का प्रयोजन बताता है।

दार्शनिक अर्थ

अवतारवाद का सिद्धांत — धर्म-संस्थापना हेतु ईश्वर का समय-समय पर अवतरण।

व्यावहारिक जीवन-शिक्षा

नैतिक/सामाजिक पतन के समय आशा एवं सुधार की संभावना के प्रतीक के रूप में लोकप्रिय रूप से उद्धृत।

श्लोक 8
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥
paritrāṇāya sādhūnāṁ vināśāya ca duṣkṛtām, dharma-saṁsthāpanārthāya sambhavāmi yuge yuge
हिन्दी अनुवाद

साधु-जनों की रक्षा हेतु, दुष्कर्मियों के विनाश हेतु तथा धर्म की स्थापना हेतु मैं युग-युग में जन्म लेता हूँ।

सरल व्याख्या

पिछले श्लोक (4.7) की निरंतरता — अवतार के तीन प्रयोजन स्पष्ट करता है।

दार्शनिक अर्थ

अवतारवाद सिद्धांत का विस्तार — धर्म-रक्षा एक चक्रीय, आवर्ती प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत।

व्यावहारिक जीवन-शिक्षा

न्याय एवं धर्म की अंततः पुनर्स्थापना में विश्वास के प्रतीक के रूप में उद्धृत।

यहाँ दी गई "सरल व्याख्या" एवं "व्यावहारिक जीवन-शिक्षा" Sanatan Unity की अपनी सरलीकृत प्रस्तुति है — यह किसी विशिष्ट पारंपरिक भाष्य (जैसे शंकराचार्य/रामानुजाचार्य/मध्वाचार्य भाष्य) का प्रतिस्थापन नहीं है।
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