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अध्याय 16 · 24 श्लोक
दैवासुरसम्पद्विभागयोगः

दैवासुरसंपद्विभागयोग

दैवी एवं आसुरी स्वभाव के गुणों का तुलनात्मक वर्णन — मानव-चरित्र की नैतिक विवेचना।

इस अध्याय के लिए विस्तृत श्लोक-दर-श्लोक व्याख्या अभी संपादकीय समीक्षा में है — शीघ्र जोड़ी जाएगी।

यहाँ दी गई "सरल व्याख्या" एवं "व्यावहारिक जीवन-शिक्षा" Sanatan Unity की अपनी सरलीकृत प्रस्तुति है — यह किसी विशिष्ट पारंपरिक भाष्य (जैसे शंकराचार्य/रामानुजाचार्य/मध्वाचार्य भाष्य) का प्रतिस्थापन नहीं है।
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