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अध्याय 18 · 78 श्लोक
मोक्षसंन्यासयोगः

मोक्षसंन्यासयोग

गीता का समापन अध्याय — संन्यास एवं त्याग का भेद, स्वधर्म का पुनः महत्व, तथा सम्पूर्ण शरणागति के उपदेश ("सर्वधर्मान्परित्यज्य...") के साथ अर्जुन का मोह-निवारण एवं युद्ध हेतु संकल्प।

श्लोक 66
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥
sarva-dharmān parityajya mām ekaṁ śaraṇaṁ vraja, ahaṁ tvāṁ sarva-pāpebhyo mokṣayiṣyāmi mā śucaḥ
हिन्दी अनुवाद

सम्पूर्ण धर्मों (कर्तव्यों/उपायों) को त्याग कर केवल मेरी शरण में आ। मैं तुझे समस्त पापों से मुक्त कर दूँगा, शोक मत कर।

सरल व्याख्या

गीता का समापन-सार माना जाने वाला श्लोक — पूर्ण शरणागति (surrender) का उपदेश।

दार्शनिक अर्थ

भक्ति-योग की पराकाष्ठा — पूर्ण समर्पण के माध्यम से मोक्ष की अवधारणा, विशेषकर वैष्णव/विशिष्टाद्वैत परंपरा में केंद्रीय।

व्यावहारिक जीवन-शिक्षा

गीता के संपूर्ण उपदेश का समापन-सार माना जाता है — विभिन्न परंपराओं में इसकी व्याख्या में अंतर है (देखें /darshan)।

यहाँ दी गई "सरल व्याख्या" एवं "व्यावहारिक जीवन-शिक्षा" Sanatan Unity की अपनी सरलीकृत प्रस्तुति है — यह किसी विशिष्ट पारंपरिक भाष्य (जैसे शंकराचार्य/रामानुजाचार्य/मध्वाचार्य भाष्य) का प्रतिस्थापन नहीं है।
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