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अध्याय 3 · 43 श्लोक
कर्मयोगः

कर्मयोग

निष्काम कर्म (फल की आसक्ति के बिना कर्तव्य-पालन) के सिद्धांत का विस्तृत विवेचन — केवल कर्म-त्याग से नहीं, अपितु सम्यक कर्म से ही सिद्धि संभव है।

श्लोक 35
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्। स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः॥
śreyān sva-dharmo viguṇaḥ para-dharmāt sv-anuṣṭhitāt, sva-dharme nidhanaṁ śreyaḥ para-dharmo bhayāvahaḥ
हिन्दी अनुवाद

अपना धर्म गुणरहित (अपूर्ण रूप से पालित) होने पर भी दूसरे के अच्छी प्रकार पालित धर्म से श्रेष्ठ है। अपने धर्म में मृत्यु भी कल्याणकारी है, परधर्म भयावह है।

सरल व्याख्या

अपने स्वभाव एवं कर्तव्य के अनुरूप जीना ही श्रेष्ठ है, दूसरे के मार्ग की नकल करने से बेहतर।

दार्शनिक अर्थ

स्वधर्म की अवधारणा — प्रत्येक व्यक्ति की अपनी प्रकृति एवं परिस्थिति के अनुरूप कर्तव्य।

व्यावहारिक जीवन-शिक्षा

दूसरों से अपनी तुलना करने के बजाय अपने वास्तविक स्वभाव एवं परिस्थिति के अनुरूप निर्णय लेने की सीख के रूप में उद्धृत किया जाता है।

यहाँ दी गई "सरल व्याख्या" एवं "व्यावहारिक जीवन-शिक्षा" Sanatan Unity की अपनी सरलीकृत प्रस्तुति है — यह किसी विशिष्ट पारंपरिक भाष्य (जैसे शंकराचार्य/रामानुजाचार्य/मध्वाचार्य भाष्य) का प्रतिस्थापन नहीं है।
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