अथर्ववेदसंहिता
अथर्ववेद
अथर्ववेद अन्य तीन वेदों से विषयवस्तु में सर्वाधिक भिन्न है — यज्ञ-केंद्रित होने के बजाय इसमें रोजमर्रा के जीवन, चिकित्सा एवं लोक-मंत्रों की प्रधानता है।
परंपरागत मत: अनादि/अपौरुषेय (परंपरागत मत); कुछ परंपराओं में इसे अन्य तीन वेदों से भिन्न स्थान भी दिया गया है।
शैक्षणिक कालनिर्धारण: भाषिक दृष्टि से अथर्ववेद को सामान्यतः चारों वेदों में सबसे परवर्ती माना जाता है, यद्यपि इसकी कुछ सामग्री प्राचीन लोक-परंपराओं से जुड़ी हो सकती है।
संरचना
20 काण्डों में विभक्त — इसमें दैनिक जीवन (रोग-निवारण, राजकीय अनुष्ठान), रक्षा-मंत्र एवं दार्शनिक सूक्त (जैसे "पृथ्वी सूक्त") सम्मिलित हैं।