राजा शिबि की करुणा
महाभारत एवं पुराणों में वर्णित कथा के अनुसार, राजा शिबि के पास एक कबूतर बाज़ (श्येन) से भयभीत होकर शरण माँगने आया। शिबि ने कबूतर को शरण दी। जब बाज़ ने अपने आहार के अधिकार की माँग की, तो शिबि ने कबूतर के बराबर अपने ही शरीर का मांस देने का प्रस्ताव रखा — परीक्षा में यह देव-परीक्षा सिद्ध हुई, जिसमें इंद्र एवं अग्नि ने ही बाज़ एवं कबूतर का रूप धारण किया था, तथा शिबि के त्याग से प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद दिया।
अर्थ
यह कथा शरणागत की रक्षा हेतु सर्वस्व त्याग के आदर्श को प्रस्तुत करती है।
नैतिक शिक्षा
शरण में आए किसी भी प्राणी की रक्षा का वचन निभाना, चाहे इसके लिए कितना भी बड़ा व्यक्तिगत त्याग क्यों न करना पड़े।
भिन्न संस्करण: यह कथा महाभारत के वन पर्व एवं मार्कण्डेय पुराण सहित कई ग्रंथों में वर्णित है।