ध्रुव की कथा
भागवत पुराण के अनुसार, राजा उत्तानपाद के पुत्र ध्रुव को सौतेली माता द्वारा राजा की गोद में बैठने से रोके जाने पर अपमान का अनुभव हुआ। इससे प्रेरित होकर, बालक ध्रुव वन में जाकर भगवान विष्णु की कठोर तपस्या करने लगे। उनकी अटूट भक्ति से प्रसन्न होकर विष्णु ने उन्हें दर्शन दिए तथा आकाश में सदैव अटल रहने वाला स्थान (ध्रुव तारा — पोल स्टार) प्रदान किया।
अर्थ
यह कथा बाल-भक्ति की शक्ति एवं दृढ़ संकल्प के फल को दर्शाती है।
नैतिक शिक्षा
आयु या परिस्थिति चाहे जो भी हो, सच्चे संकल्प एवं समर्पण से असंभव भी संभव हो सकता है।
भिन्न संस्करण: भागवत पुराण के चतुर्थ स्कंध में यह कथा विस्तार से वर्णित है; अन्य पुराणों में इसके संक्षिप्त संदर्भ मिलते हैं।