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🧠 दार्शनिक विचार purva_mimamsa
पूर्व मीमांसा

पूर्व मीमांसा दर्शन

पूर्व मीमांसा दर्शन वैदिक कर्मकाण्ड (यज्ञ-विधियों) की व्याख्या एवं शब्द-प्रामाण्य (वेद-वाक्यों की स्वतःसिद्ध प्रामाणिकता) पर केंद्रित है।

पाठ्य आधार

मीमांसासूत्र (जैमिनि)

प्रमुख चिंतक

महर्षि जैमिनि, कुमारिल भट्ट, प्रभाकर (भाष्यकार)

आत्मा/स्वयं की अवधारणा

आत्मा को कर्म-फल का भोक्ता, नित्य द्रव्य के रूप में स्वीकार करता है।

यथार्थ की अवधारणा

वेद-वाक्यों को अपौरुषेय (मानव-रचित नहीं) एवं स्वतः-प्रामाणिक माना जाता है — यह दर्शन ईश्वर की सृष्टि-कर्ता भूमिका पर बहुत बल नहीं देता, कर्मकाण्ड के स्वतःसिद्ध प्रभाव पर अधिक केंद्रित है।

मोक्ष का मार्ग

यज्ञ-कर्मों के सम्यक अनुष्ठान से धर्म-पालन एवं स्वर्ग-प्राप्ति (परवर्ती व्याख्याओं में मोक्ष की चर्चा भी जुड़ी)।

विभिन्न परंपराओं में व्याख्या-भेद: पूर्व मीमांसा एवं उत्तर मीमांसा (वेदांत) दोनों वेदों को प्रमाण मानते हैं, परंतु मीमांसा कर्मकाण्ड (यज्ञ) पर केंद्रित है जबकि वेदांत ज्ञानकाण्ड (उपनिषदों) पर।