कर्मन्
कर्म
कर्म का शाब्दिक अर्थ है "क्रिया/कर्तव्य", परंतु दार्शनिक अर्थ में यह उस सिद्धांत को संदर्भित करता है जिसके अनुसार प्रत्येक क्रिया (शारीरिक, वाचिक या मानसिक) का एक अनुरूप परिणाम (फल) होता है, जो वर्तमान या भविष्य के जीवन को प्रभावित करता है।
पाठ्य आधार
भगवद्गीता (विशेषकर अध्याय 2-4), उपनिषद, विभिन्न दर्शन-ग्रंथ
प्रमुख चिंतक
यह अवधारणा किसी एक दार्शनिक तक सीमित नहीं — प्रायः सभी भारतीय दर्शन-परंपराओं में किसी न किसी रूप में स्वीकृत है।
विभिन्न परंपराओं में व्याख्या-भेद: ### सभी परंपराओं में कर्म का मूल सिद्धांत (क्रिया-फल संबंध) साझा है, परंतु इसकी क्रियान्विति की व्याख्या में अंतर है — योग एवं वेदांत परंपरा में कर्म को ज्ञान/भक्ति के माध्यम से "जलाया" जा सकता है, जबकि पूर्व मीमांसा कर्मकाण्ड के स्वतःसिद्ध फल पर अधिक बल देती है।
ग्रंथों में यह अवधारणा मिलती है — यह वैज्ञानिक रूप से सिद्ध नियम नहीं, अपितु एक दार्शनिक/धार्मिक सिद्धांत है (देखें /karma-and-punarjanma पृष्ठ)।
ग्रंथों में यह अवधारणा मिलती है — यह वैज्ञानिक रूप से सिद्ध नियम नहीं, अपितु एक दार्शनिक/धार्मिक सिद्धांत है (देखें /karma-and-punarjanma पृष्ठ)।