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🧠 दार्शनिक विचार
ब्रह्मन्

ब्रह्म

ब्रह्म वेदांत दर्शन में परम सत्य/परम तत्त्व को कहा जाता है — वह अनंत, शाश्वत चेतना जो सम्पूर्ण सृष्टि का मूल आधार मानी जाती है।

पाठ्य आधार

उपनिषद (विशेषकर "सर्वं खल्विदं ब्रह्म" — छान्दोग्य उपनिषद), ब्रह्मसूत्र

प्रमुख चिंतक

आदि शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य — तीनों की ब्रह्म-व्याख्या भिन्न-भिन्न है।

यथार्थ की अवधारणा

ब्रह्म को "सत्-चित्-आनंद" (अस्तित्व-चेतना-आनंद) स्वरूप कहा जाता है।

विभिन्न परंपराओं में व्याख्या-भेद: ### सगुण ब्रह्म (गुण/रूप सहित, भक्ति-योग्य ईश्वर) एवं निर्गुण ब्रह्म (निराकार, गुणातीत परम तत्त्व) — दोनों की अवधारणा उपनिषदों में मिलती है, तथा विभिन्न वेदांत-उप-परंपराएँ इन पर अलग-अलग बल देती हैं।