आत्मन्
आत्मा
आत्मा उस चेतन, शाश्वत तत्त्व को कहा जाता है जो शरीर, मन एवं बुद्धि से भिन्न — व्यक्ति का वास्तविक/मूल स्वरूप माना जाता है।
पाठ्य आधार
उपनिषद (विशेषकर बृहदारण्यक, छान्दोग्य, कठ), भगवद्गीता अध्याय 2
प्रमुख चिंतक
याज्ञवल्क्य, आदि शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य
आत्मा/स्वयं की अवधारणा
देखें tradition_comparison।
यथार्थ की अवधारणा
आत्मा शरीर-मन से भिन्न, नित्य, अजन्मा एवं अविनाशी तत्त्व है (गीता 2.20 — देखें /bhagavad-gita)।
मोक्ष का मार्ग
आत्म-ज्ञान (स्वयं की वास्तविक प्रकृति को पहचानना) मोक्ष का मार्ग है।
विभिन्न परंपराओं में व्याख्या-भेद: ### अद्वैत वेदांत: आत्मा एवं ब्रह्म अभिन्न हैं ("अहं ब्रह्मास्मि")।
### विशिष्टाद्वैत: आत्मा ब्रह्म का ही एक अंश/भाग है, परंतु स्वतंत्र व्यक्तित्व बनाए रखती है।
### द्वैत: आत्मा ब्रह्म से सदैव भिन्न रहती है, कभी अभिन्न नहीं होती।
### सांख्य-योग: आत्मा (पुरुष) प्रकृति से पूर्णतः भिन्न, शुद्ध साक्षी चेतना है।
### विशिष्टाद्वैत: आत्मा ब्रह्म का ही एक अंश/भाग है, परंतु स्वतंत्र व्यक्तित्व बनाए रखती है।
### द्वैत: आत्मा ब्रह्म से सदैव भिन्न रहती है, कभी अभिन्न नहीं होती।
### सांख्य-योग: आत्मा (पुरुष) प्रकृति से पूर्णतः भिन्न, शुद्ध साक्षी चेतना है।