वरुण
वरुण
अन्य नाम: जलेश, अप्पति
वरुण वैदिक काल में ऋत (सृष्टि की नैतिक/ब्रह्मांडीय व्यवस्था) के रक्षक एवं जल के स्वामी माने जाते थे — वैदिक काल में इनका महत्व अत्यंत उच्च था। पौराणिक काल में इनकी भूमिका मुख्यतः समुद्र/जल के देवता तक सीमित हो गई।
प्रतीकात्मकता
पाश (नैतिक व्यवस्था पर नियंत्रण), मकर-वाहन (जल पर आधिपत्य)।
स्वरूप
जलेश्वर (समुद्र/जल के अधिपति रूप में पौराणिक काल में)।
कथाएँ
ऋत (ब्रह्मांडीय नैतिक व्यवस्था) के रक्षक के रूप में वैदिक सूक्तों में वर्णित।
उपासना
मुख्यतः वैदिक यज्ञ-परंपरा में स्मरणीय।
विभिन्न सम्प्रदायों (वैष्णव/शैव/शाक्त) में इस देवता/देवी की व्याख्या एवं महत्व भिन्न हो सकता है — यह पृष्ठ किसी एक परंपरा को सार्वभौमिक नहीं मानता।
प्रसिद्ध मंदिर
वरुण के समर्पित स्वतंत्र मंदिर भारत में अत्यंत सीमित हैं।