इन्द्र
इंद्र
अन्य नाम: देवराज, शचीपति, पुरंदर
इंद्र ऋग्वेद के सबसे अधिक स्तुति किए गए देवता हैं — देवताओं के राजा, वर्षा एवं वज्र (मेघ-गर्जन) के देवता। पौराणिक काल में इनका महत्व वैदिक काल की तुलना में अपेक्षाकृत कम हो गया, जबकि शिव-विष्णु केंद्रीय हो गए।
प्रतीकात्मकता
वज्र (शक्ति), ऐरावत हाथी (राजसी सत्ता), इंद्रधनुष (मेघ-वर्षा से संबंध)।
स्वरूप
देवराज इंद्र (स्वर्ग के राजा रूप में)।
कथाएँ
वृत्रासुर-वध (जल को मुक्त करने की वैदिक कथा); कई पौराणिक कथाओं में इंद्र को अहंकार के कारण चुनौती का सामना करते दिखाया गया है (जैसे गोवर्धन-कथा में कृष्ण द्वारा इंद्र-पूजा रोकना)।
उपासना
मुख्यतः वैदिक यज्ञ-परंपरा में — वर्तमान में स्वतंत्र दैनिक उपासना सीमित।
विभिन्न सम्प्रदायों (वैष्णव/शैव/शाक्त) में इस देवता/देवी की व्याख्या एवं महत्व भिन्न हो सकता है — यह पृष्ठ किसी एक परंपरा को सार्वभौमिक नहीं मानता।
प्रसिद्ध मंदिर
इंद्र के समर्पित स्वतंत्र मंदिर भारत में अत्यंत सीमित हैं।