प्राचीन भारत में धातु-विज्ञान (metallurgy) के उन्नत कौशल का सर्वाधिक प्रसिद्ध प्रमाण दिल्ली का लौह स्तंभ है — यह लगभग चौथी-पाँचवीं शताब्दी ई. का बना, लगभग 7 मीटर ऊँचा तथा 6 टन से अधिक भारी शुद्ध लौह-स्तंभ है, जो 1600 वर्षों से अधिक समय बीतने पर भी अपेक्षाकृत कम संक्षारण (जंग) दर्शाता है।
धातुविज्ञानियों द्वारा किए गए वैज्ञानिक अध्ययनों (जैसे भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, कानपुर के शोधकर्ताओं द्वारा) के अनुसार, इसकी संक्षारण-प्रतिरोधक क्षमता का कारण इसमें फॉस्फोरस की उच्च मात्रा तथा लौह-अयस्क के प्रसंस्करण की विशिष्ट पारंपरिक विधि मानी जाती है, जो लौह की सतह पर एक सुरक्षात्मक परत (misawite) बनाती है — यह आधुनिक धातुविज्ञान द्वारा वैज्ञानिक रूप से अध्ययित एवं आंशिक रूप से समझा गया एक वास्तविक ऐतिहासिक/तकनीकी उपलब्धि है।