भारतीय खगोलशास्त्र की एक समृद्ध, गणितीय रूप से उन्नत परंपरा रही है। आर्यभट (499 ई.) ने पृथ्वी के अक्षीय घूर्णन का स्पष्ट कथन दिया, ग्रहणों की गणितीय व्याख्या प्रस्तुत की, तथा सौर वर्ष की लंबाई की सटीक गणना की। वराहमिहिर की "पंचसिद्धांतिका" (छठी शताब्दी) उस समय प्रचलित पाँच खगोलीय सिद्धांतों (जिनमें ग्रीक-प्रभावित "रोमक सिद्धांत" भी शामिल है) का तुलनात्मक संकलन प्रस्तुत करती है, जो दर्शाती है कि भारतीय खगोलशास्त्र अन्य परंपराओं के साथ सक्रिय संवाद में था।
भास्कराचार्य के "सिद्धांतशिरोमणि" (1150 ई.) में ग्रहों की गति, ग्रहण-गणना एवं गोलीय त्रिकोणमिति पर विस्तृत कार्य मिलता है।
सावधानी-पूर्ण स्पष्टीकरण: इन उपलब्धियों की सराहना करते हुए भी यह ध्यान रखना आवश्यक है कि इन्हें आधुनिक खगोल-भौतिकी (astrophysics) के समकक्ष नहीं माना जाना चाहिए — आधुनिक खगोलशास्त्र दूरबीन-आधारित अवलोकन, गुरुत्वाकर्षण के भौतिक सिद्धांतों एवं प्रायोगिक सत्यापन पर आधारित है, जबकि प्राचीन भारतीय खगोलशास्त्र मुख्यतः गणितीय प्रतिमानों एवं नग्न-आँख अवलोकन पर आधारित था। दोनों की उपलब्धियाँ अपने-अपने ऐतिहासिक संदर्भ में सम्मान की पात्र हैं, बिना एक-दूसरे को अतिशयोक्तिपूर्ण ढंग से "समान" घोषित किए।